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Thursday, June 23, 2016

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता



Tuesday, May 3, 2016

घर के पास का मैदान...

खाली पड़ा है कुछ दिन से घर के पास का मैदान,
कोई मोबाइल बच्चो की गेंद चुरा ले गया...

Monday, December 21, 2015

गर्म हौसले...

रजाईयां नहीं हैं उनके नसीब में...
गरीब गर्म हौसले ओढ़कर सो जाते हैं


Monday, June 15, 2015

बारिश मे...

जिनके पास सिर्फ सिक्के थे वो मजे से भीगते रहे..
जिनके पास नोटे थे वो छत तलाशते रह गए...!!


Tuesday, March 24, 2015

बस एक लम्हे का झगड़ा था...

बस एक लम्हे का झगड़ा था
दर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़
जैसे काँच गिरता है
हर एक शय में गई
उड़ती हुई, चलती हुई, किरचें
नज़र में, बात में, लहजे में,
सोच और साँस के अन्दर
लहू होना था इक रिश्ते का
सो वो हो गया उस दिन
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फर्श से उस शब
किसी ने काट ली नब्जें
न की आवाज़ तक कुछ भी
कि कोई जाग न जाए
बस एक लम्हे का झगड़ा था

Friday, March 14, 2014

दरवाज़ा खोल दो...

यहाँ हर किसी को दरारों में झाँकने की आदत है,
दरवाज़ा खोल दो, कोई पूछने भी नहीं आएगा....!


Monday, February 10, 2014

वो भी क्या दिन थे...

वो भी क्या दिन थे...
मम्मी कि गोद और पापा के कंधे...
न पैसे की सोच न लाइफ के फंडे...
न कल की चिंता न फ्यूचर के सपने...
और अब कल की फ़िक्र और अधूरे सपने...
मुड़कर देखा तो बहुत दूर हैं अपने...
मंज़िलों को ढूंढते हम कहाँ खो गए...
न जाने क्यों हम इतने बड़े हो गए... 


Monday, January 6, 2014

उसके हाथ...

जब कभी मैं उसका हाथ पकड़ता तो वो कहती...
"तुम्हारे हाथ कितने गरम हैं..."
गरम हाथ वफ़ा की निशानी होते हैं। 
ये सुन के मैं इतना खुश होता कि सबकुछ भूल जाता था।
और आज इतनी मुद्दत बाद मुझे याद आया...
उसके हाथ कितने ठन्डे थे...


Wednesday, October 16, 2013

मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था...

मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था
कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ को
हवाओं में लहराता आता था दामन
कि दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझको
कदम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे
कि आवाज़ देकर बुला लेगी मुझ को
मगर उसने रोका,
न उसने मनाया
न दामन ही पकड़ा
न मुझको बिठाया
न आवाज़ ही दी
न वापस बुलाया
मैं अहिस्ता अहिस्ता बढता ही आया
यहाँ तक कि उस से जुदा हो गया मैं
जुदा हो गया मैं , जुदा हो गया मैं...

कैफी आज़मी.


Sunday, August 25, 2013

बरस रहा है उदास पानी...

बरस रहा है उदास पानी...


Thursday, August 1, 2013

वो आयी थी क्या?

मैं रोज़गार के सिलसिले में
कभी-कभी उसके शहर जाता हूं तो
गुज़रता हूं उस गली से

वो नीम तारीक सी गली
और उसी के नुक्कड़ पे उंघता सा पुराना खम्बा
उसी के नीचे तमाम शब इंतज़ार करके
मैं छोड़ आया था शहर उसका

बहुत ही खस्ता सी रोशनी की छड़ी को टेके
वो खम्बा अब भी वहीं खड़ा है

फुतूर है ये मगर
मैं खम्बे के पास जा कर
नज़र बचाकर महल्ले वालों की
पूछ लेता हूं आज भी ये

वो मेरे जाने के बाद, आयी तो नहीं थी
वो आयी थी क्या?

-गुलज़ार

 

Monday, July 1, 2013

मोहे पिया के मिलन की आस...

कागा रे कागा रे मोरी इतनी अरज तोसे चुन चुन खइयो मॉस
अरजिया रे खाइयों न तू नैना मोरे खइयो न दो नैना
मोहे पिया के मिलन की आस...

-बाबा शेख़ फरीद.
 
 

Tuesday, June 4, 2013

मुस्कुराना इसको कहते हैं...

नमक भर कर मेरे ज़ख्मों में तुम क्या मुस्कुराते हो
मेरे ज़ख्मों को देखो मुस्कुराना इसको कहते हैं...


Friday, May 31, 2013

जब तक उधार बाकी है...

ज़िन्दगी मौत से मांगी हुई दौलत है 'तरुण' 
चैन तब तक कहाँ जब तक उधार बाकी है...


Saturday, May 25, 2013

सितारों की कहानी...

हमसे पूछना है तो, सितारों की कहानी पूछो,
ख्वाब की बात वो जाने जिन्हें नींद आती है !!


Wednesday, May 15, 2013

ख़ामोशी से...


Tuesday, May 14, 2013

अगर वो पूछ लें हमसे

अगर वो पूछ लें हमसे तुम्हें किस बात का गम है 
तो फिर किस बात का गम हो अगर वो पूछ लें हमसे...


Thursday, May 9, 2013

उसे भूल जा...

कहाँ आ के रुकने थे रास्ते, कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
वो जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला, उसे भूल जा

वो तेरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं
दिल-ए-बेखबर मेरी बात सुन, उसे भूल जा, उसे भूल जा

किसी आंख में नहीं अश्क-ए-ग़म, तेरे बाद कुछ भी नहीं है कम
तुझे ज़िन्दगी ने भुला दिया, तू भी मुस्करा, उसे भूल जा

न वो आंख ही तेरी आंख थी, न वो ख्वाब ही तेरा ख्वाब था,
दिल-ए-मुन्तजिर तो ये किस लिए तेरा जागना, उसे भूल जा

जो बिसात-ए-जाँ ही उलट गया, वो जो रास्ते से पलट गया..
उसे रोकने से हुसूल क्या, उसे मत बुला, उसे भूल जा

तुझे चाँद बन के मिला था जो, तेरे साहिलों पे खिला था जो,
वो था एक दरिया विसाल का, सो उतर गया, उसे भूल जा…


Wednesday, May 1, 2013

आखरी ख़त...

वो भी शायद रो पड़े वीरान  कागज़ देख कर
मैंने उसको आखरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं
 
 

Tuesday, April 30, 2013

मुझको भी तरकीब सिखा दो यार जुलाहे...

मुझको भी तरकीब सिखा दो यार जुलाहे
अकसर तुझको देखा है एक ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या खत्म हुआ
फिर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिरह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई
मैनें तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिराहें
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे
मुझको भी तरकीब सिखा दो यार जुलाहे
गुलज़ार.